Saturday, July 22, 2017

केकड़ा और लहर

केकड़ा और लहर

*एक बार एक केकड़ा 🦀 समुद्र किनारे अपनी मस्ती में चला जा रहा था और बीच बीच में रुक रुक कर अपने पैरों 🐾के निशान देख कर खुश होता ।*

*आगे बढ़ता पैरों के निशान देखता उससे बनी डिज़ाइन देखकर और खुश होता,,,,,*

*इतने में एक लहर🌊 आयी और उसके पैरों के सब निशान मिट गये।*

*इस पर केकड़े 🦀को बड़ा गुस्सा आया, उसने लहर से बोला --*
*"ए लहर मैं तो तुझे अपना मित्र मानता था, पर ये तूने क्या किया ? मेरे बनाये सुंदर पैरों के निशानों को ही मिटा दिया कैसी दोस्त हो तुम ।"*

*तब लहर बोली, " वो देखो पीछे से मछुआरे लोग पैरों के निशान देख कर ही तो केकड़ों को पकड़ रहे हैं,,,*
*हे मित्र ! तुमको वो पकड़ न लें , बस इसीलिए मैंने निशान मिटा दिए !*

*ये सुनकर केकड़े की आँखों में आँसू आगये ।*

*सच यही है कई बार हम सामने वाले की बातों को समझ नहीं पाते और अपनी सोच अनुसार उसे गलत समझ लेते हैं।*

*जबकि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं।*

*अतः मन में बैर लाने से बेहतर है कि हम सोच समझ कर निष्कर्ष निकालें !!*

Sunday, July 16, 2017

ब्लैक स्पॉट

▪▪▪▪ *ब्लैक_स्पाट* ▪▪▪▪

एक दिन एक प्रोफ़ेसर अपनी क्लास में आते ही बोला, “चलिए, *surprise test* के लिए तैयार हो जाइये ।

सभी स्टूडेंट्स घबरा गए…  कुछ किताबों के पन्ने पलटने लगे तो कुछ सर के दिए नोट्स जल्दी-जल्दी पढने लगे ।

“ये सब कुछ काम नहीं आएगा….”, प्रोफेसर मुस्कुराते हुए बोले, *“मैं Question paper आप सबके सामने रख रहा हूँ, जब सारे पेपर बट जाएं तभी आप उसे पलट कर देखिएगा”*  पेपर बाँट दिए गए ।

“ठीक है ! अब आप पेपर देख सकते हैं, प्रोफेसर ने निर्देश दिया ।

अगले ही क्षण सभी Question paper को निहार रहे थे, *पर ये क्या* ?  इसमें तो कोई प्रश्न ही नहीं था !  *था तो सिर्फ वाइट पेपर पर एक ब्लैक स्पॉट*!

*ये क्या सर* ?  इसमें तो कोई question ही नहीं है,  एक छात्र खड़ा होकर बोला ।

प्रोफ़ेसर बोले, “जो कुछ भी है आपके सामने है ।  आपको बस इसी को एक्सप्लेन करना है… और *इस काम के लिए आपके पास सिर्फ 10 मिनट हैं…चलिए शुरू हो जाइए…”*

स्टूडेंट्स के पास कोई चारा नहीं था…वे अपने-अपने answer लिखने लगे ।

समय ख़त्म हुआ, प्रोफेसर ने answer sheets collect की और बारी-बारी से उन्हें पढने लगे ।

लगभग सभी ने *ब्लैक स्पॉट* को अपनी-अपनी तरह से समझाने की कोशिश की थी, लेकिन किसी ने भी उस स्पॉट के चारों ओर मौजूद white space के बारे में बात नहीं की थी ।

प्रोफ़ेसर गंभीर होते हुए बोले, *“इस टेस्ट का आपके academics से कोई लेना-देना नहीं है और ना ही मैं इसके कोई मार्क्स देने वाला हूँ….*   इस टेस्ट के पीछे मेरा एक ही मकसद है ।  *मैं आपको जीवन की एक अद्भुत सच्चाई बताना चाहता हूँ…*

देखिये… *इस पूरे पेपर का 99% हिस्सा सफ़ेद है…लेकिन आप में से किसी ने भी इसके बारे में नहीं लिखा और अपना 100% answer सिर्फ उस एक चीज को explain करने में लगा दिया जो मात्र 1% है… और यही बात हमारे life में भी देखने को मिलती है…*

समस्याएं हमारे जीवन का एक छोटा सा हिस्सा होती हैं, लेकिन हम अपना पूरा ध्यान इन्ही पर लगा देते हैं… *कोई दिन रात अपने looks को लेकर परेशान रहता है तो कोई अपने करियर को लेकर चिंता में डूबा रहता है, तो कोई और बस पैसों का रोना रोता रहता है ।*

क्यों नहीं *हम अपनी blessings को count करके खुश होते हैं…* क्यों नहीं *हम पेट भर खाने के लिए भगवान को थैंक्स कहते हैं…* क्यों नहीं *हम अपनी प्यारी सी फैमिली के लिए शुक्रगुजार होते हैं….* क्यों नहीं *हम लाइफ की उन 99% चीजों की तरफ ध्यान देते हैं जो सचमुच हमारे जीवन को अच्छा बनाती हैं ।*

तो चलिए *आज से हम life की problems को ज़रुरत से ज्यादा seriously लेना छोडें और जीवन की छोटी-छोटी खुशियों को ENJOY करना सीखें ….* 

*तभी हम ज़िन्दगी को सही मायने में जी पायेंगे..*

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Wednesday, May 3, 2017

बेटी और बेटा

                   बेटी और बेटा
एक संत की कथा में एक बालिका खड़ी हो गई।
चेहरे पर झलकता आक्रोश...

संत ने पूछा - बोलो बेटी क्या बात है?

बालिका ने कहा- महाराज हमारे समाज में लड़कों को हर प्रकार की आजादी होती है।
वह कुछ भी करे, कहीं भी जाए उस पर कोई खास टोका टाकी नहीं होती।
इसके विपरीत लड़कियों को बात बात पर टोका जाता है।
यह मत करो, यहाँ मत जाओ, घर जल्दी आ जाओ आदि।

संत मुस्कुराए और कहा...

बेटी तुमने कभी लोहे की दुकान के बाहर पड़े लोहे के गार्डर देखे हैं?
ये गार्डर सर्दी, गर्मी, बरसात, रात दिन इसी प्रकार पड़े रहते हैं।
इसके बावजूद इनका कुछ नहीं बिगड़ता और इनकी कीमत पर भी कोई अन्तर नहीं पड़ता।
लड़कों के लिए कुछ इसी प्रकार की सोच है समाज में।

अब तुम चलो एक ज्वेलरी शॉप में।
एक बड़ी तिजोरी, उसमें एक छोटी तिजोरी।
उसमें रखी छोटी सुन्दर सी डिब्बी में रेशम पर नज़ाकत से रखा चमचमाता हीरा।
क्योंकि जौहरी जानता है कि अगर हीरे में जरा भी खरोंच आ गई तो उसकी कोई कीमत नहीं रहेगी।

समाज में बेटियों की अहमियत भी कुछ इसी प्रकार की है।
पूरे घर को रोशन करती झिलमिलाते हीरे की तरह।
जरा सी खरोंच से उसके और उसके परिवार के पास कुछ नहीं बचता।
बस यही अन्तर है लड़कियों और लड़कों में।

पूरी सभा में चुप्पी छा गई।
उस बेटी के साथ पूरी सभा की आँखों में छाई नमी साफ-साफ बता रही थी लोहे और हीरे में फर्क।।।

Sunday, April 30, 2017

कर्म और भाग्य

✍एक पान वाला था। जब भी पान खाने जाओ ऐसा लगता कि वह हमारा ही रास्ता देख रहा हो। हर विषय पर बात करने में उसे बड़ा मज़ा आता। कई बार उसे कहा कि भाई देर हो जाती है जल्दी पान लगा दिया करो पर उसकी बात ख़त्म ही नहीं होती।

एक दिन अचानक कर्म और भाग्य पर बात शुरू हो गई।

तक़दीर और तदबीर की बात सुन मैंने सोचा कि चलो आज उसकी फ़िलासफ़ी देख ही लेते हैं। मैंने एक सवाल उछाल दिया।

मेरा सवाल था कि आदमी मेहनत से आगे बढ़ता है या भाग्य से?

और उसके जवाब से मेरे दिमाग़ के सारे जाले ही साफ़ हो गए।

कहने लगा,आपका किसी बैंक में लॉकर तो होगा?

उसकी चाभियाँ ही इस सवाल का जवाब है। हर लॉकर की दो चाभियाँ होती हैं।

एक आप के पास होती है और एक मैनेजर के पास।

आप के पास जो चाभी है वह है परिश्रम और मैनेजर के पास वाली भाग्य।

जब तक दोनों नहीं लगतीं ताला नहीं खुल सकता।

आप कर्मयोगी पुरुष हैं और मैनेजर भगवान।

अाप को अपनी चाभी भी लगाते रहना चाहिये।पता नहीं ऊपर वाला कब अपनी चाभी लगा दे। कहीं ऐसा न हो कि भगवान अपनी भाग्यवाली चाभी लगा रहा हो और हम परिश्रम वाली चाभी न लगा पायें और ताला खुलने से रह जाये ।

This is a beautiful interpretation of Karma and Bhagya🤔⁠

Thursday, January 1, 2015

जमादार




                                                                      जमादार

एक अत्यंत असभ्य किसान, जो की अधेड़ उम्र पार कर चुका था, एक बौद्ध मठ के द्वार पर आकर खड़ा हो गया।
जब भिक्षुओं ने मठ का द्वार खोला तो उस किसान ने अपना परिचय कुछ इस प्रकार दिया, " भिक्षु मित्रों ! मैं
विश्वास से ओतप्रोत हूँ। और मैं आप लोगों से अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करना चाहता हूँ। " उससे बात करने के बाद भिक्षुओं ने आपस में बातचीत की और यह निष्कर्ष निकाला कि चूँकि इस किसान में चतुरता और सभ्यता की
कमी लग रही थी अतः ज्ञान प्राप्त करना भिक्षुओं को उसके बस की बात नहीं लगी। और आत्मविकास के विषय में समझ पाना तो उस किसान के लिए असंभव सा प्रतीत होता था।
                                                
किन्तु, वह व्यक्ति आशा और विश्वास से भरपूर प्रतीत होता था, अतः भिक्षुओं ने उसे कहा, " भले आदमी! तुम्हे
इस मठ की सफाई की संपूर्ण ज़िम्मेदारी सौंपी जाती है। रोजाना तुम्हें इस मठ को पूरी तरह से साफ़ रखना है।
 हाँ ! तुम्हें यहाँ रहने और खाने-पीने की सुविधा प्रदान की जाएगी।"
कुछ माह के पश्चात उस मठ के भिक्षुओं ने पाया की वह किसान अब पहले से अधिक शांत प्रतीत होता था, अब
उसके चेहरे पर हर समय एक मुस्कान फ़ैली रहती थी और उसकी आँखों में एक अभूतपूर्व चमक हर समय
दिखाई देती थी। वह हर समय सुखी, सन्तुष्ट, संतुलित और शांति से भरपूर दिखाई देने लगा था।
अंततः भिक्षुओं से रहा न गया और उन्होंने उस किसान से पूछ ही लिया, " भले आदमी ! ऐसा प्रतीत होता है
कि इन महीनों में, जबसे तुम यहाँ आये हो, तुम्हारे भीतर एक अभूतपूर्व अध्यात्मिक परिवर्तन हुआ है।
क्या तुम किसी विशेष नियम या ध्यान की किसी विशेष विधि का पालन कर रहे हो? " और इस पर उस किसान ने उत्तर दिया, " भाइयों, मैं पूरी लगन, मेहनत और प्रेम से अपने लक्ष्य को पूर्ण करने में लगा रहता हूँ।" और मेरा लक्ष्य है, इस मठ को स्वच्छ रखना। मेरे मस्तिष्क में मेरा लक्ष्य एकदम स्पष्ट
है। और हाँ ! जैसे-जैसे मैं इस मठ की गन्दगी और कूड़े-करकट को साफ़ करता हूँ, वैसे-वैसे मैं कल्पना करता
हूँ, कि  जैसे मेरे मन से धोखा, ईर्ष्या, द्वेष, लालच और घृणा की भावनाएं भी बाहर निकल रही हैं, समाप्त हो रही हैं। और इसी कारण, प्रत्येक दिन मैं पहले से सुखी होता जाता हूँ ।

करने  म से अपने लक्ष्य को पूर्ण करने में लगा रहता हूँ।
 और मेरा लक्ष्य है "
  

सच्चा सुख


                                                                      सच्चा सुख 

एक युवक जो कि एक विश्वविद्यालय का विद्यार्थी था, एक दिन शाम के समय एक प्रोफ़ेसर साहब के साथ 
टहलने निकला हुआ था। यह प्रोफ़ेसर साहब सभी विद्यार्थियों के चहेते थे और विद्यार्थी भी उनकी दयालुता के 
कारण उनका बहुत आदर करते थे। टहलते-टहलते वह विद्यार्थी प्रोफ़ेसर साहब के साथ काफ़ी दूर तक निकल 
गया और तभी उन दोनों की दृष्टि एक जोड़ी फटे हुए जूतों पर पड़ी। उन दोनों को वह जूते एक गरीब किसान के 
लगे जो कि पास के ही किसी खेत में मजदूरी कर रहा था और बस आने ही वाला था। 
वह विद्यार्थी प्रोफ़ेसर साहब की ओर मुड़ा और बोला, " आइये इन जूतों को छुपा देते हैं। और फिर हम लोग इन 
झाड़ियों के पीछे छुप जाते हैं। जब वह किसान काम करके वापस आएगा और अपने जूतों को ढूंढेगा तो उसे 
परेशान होकर इधर-उधर ढूंढ़ता देखने पर कितना मज़ा आएगा।"
                                           
इस पर प्रोफेसर साहब बोले, " मेरे प्यारे दोस्त ! हमें कभी भी किसी गरीब को दुखी करके ख़ुश नहीं होने चाहिए।
तुम तो काफ़ी अमीर हो और तुम्हें अच्छा ख़ासा जेब खर्च मिलता है। तुम एक काम करो ! इन दोनों जूतों में 
तुम बीस-बीस रुपये डाल  दो। और फ़िर हम लोग देखेंगे कि जब किसान को यह पैसा मिलेगा तो तुम्हें कैसा 
महसूस होता है। " उस विद्यार्थी ने ठीक वैसा ही किया और फ़िर दोनों पास की एक झाड़ी के पीछे छुप गए।
जल्दी ही उस गरीब किसान का काम समाप्त हो गया और वह लौट कर वहीँ आया जहाँ उसने अपने फटे पुराने 
जूते उतारे थे। जैसे ही उसने एक पैर जूते में डाला, उसे लगा कि पैर में कोई कागज़ सा छू रहा है। जब उसने 
जूते में हाथ डालकर देखा तो एक बीस रुपये का नोट पाया। उसके चेहरे पर आश्चर्य के भाव स्पष्ट रूप से दिख 
रहे थे। उसने बीस रुपये के नोट को उलट पलट के देखा कि कहीं वह नकली तो नहीं था। फिर उसने चारों  ओर देखा कि शायद कोई दिख जाये, किन्तु कोई दिखाई न दिया। अब उसने वह नोट अपनी जेब में रख लिया 
और अपना पैर दूसरे जूते में डाला, किन्तु दूसरे में भी एक और नोट पाकर उसका आश्चर्य दुगना हो गया।
अब उसका अपनी भावनाओं को नियंत्रित करना अत्यंत कठिन हो गया। वह अपने घुटनों के बल बैठ गया
और उसके दोनों हाथ अकस्मात् आकाश की और उठ गए। उसने आकाश की ओर देखा और ईश्वर के प्रति
कृतज्ञता और धन्यवाद के शब्द मानो बरबस ही उसके मुख से फूट निकले। वह दिल खोलकर बोला अपनी 
अस्वस्थ और असहाय पत्नी के बारे में जिसका अब वह इलाज करा पायेगा। वह बोला अपने भूख से बिलबिलाते 
बच्चों के बारे में जिनको वह आज भरपेट भोजन करवा पाएगा।
झाड़ियों  के पीछे वह विद्यार्थी और प्रोफ़ेसर सब कुछ सुन रहे थे और उन दोनों की आँखों में ख़ुशी के आँसू थे।
प्रोफ़ेसर ने विद्यार्थी से कहा, "अब बताओ यदि तुम उस गरीब किसान के फटे जूते छुपा देते तब तुम्हें ज़्यादा
ख़ुशी मिलती या अब ज़्यादा ख़ुशी मिलती ?"
इस पर वह विद्यार्थी बोला, "आज आपने मुझे एक ऐसी शिक्षा दी है जो की मैं जीवन में कभी नहीं भूल पाउँगा।
और, यह मैं यह पहले कभी नहीं समझ पाया था कि, जो सुख देने में है वह लेने में नहीं।"



मैने तुम्हें बनाया



                                                  मैने तुम्हें बनाया 

एक दिन की घटना है । एक छोटी सी लड़की फटे पुराने कपड़ो में एक सड़क के कोने पर खड़ी भीख मांग रही थी । न तो उसके पास खाने को था, न ही पहनने के लिए ठीक ठाक कपड़े थे और न ही उसे शिक्षा प्राप्त हो पा रही थी ।
वह बहुत ही गन्दी बनी हुई थी, कई दिनों से नहाई नहीं थी और उसके बाल भी बिखरे हुए थे । तभी एक अच्छे घर का संभ्रांत युवा अपनी कार में उस चौराहे से निकला और उसने उस लड़की को देखते हुए भी 
अनदेखा कर दिया । अंततः वह अपने आलीशान घर में  पहुंचा जहाँ सुख  सुविधा के सभी साधन उपलब्ध थे । तमाम नौकर चाकर थे, भरा पूरा सुखी परिवार था । 
जब वह रात्रि का भोजन करने के लिए अनेक व्यंजनों से भरी
हुई मेज पर बैठा तो अनायास ही उस अनाथ भिखारी बच्ची की तस्वीर उसकी आँखों के सामने आ गयी । उस 
बिखरे बालों वाली फटे पुराने कपड़ों में छोटी सी भूखी बच्ची की याद आते ही वह व्यक्ति ईशवर पर बहुत नाराज़ हुआ । उसने ईश्वर को ऐसी व्यवस्था के लिए बहुत धिक्कारा कि उसके पास तो सारे सुख साधन मौजूद थे और एक निर्दोष लड़की के पास न खाने को था और न ही वह शिक्षा प्राप्त कर पा रही थी । अंततः उसने ईश्वर को कोसा,  " हे ईश्वर आप ऐसा कैसे होने दे रहे हैं ? आप इस लड़की की मदद करने के लिए कुछ करते क्यों नहीं  ?" इस प्रकार बोल कर वह खाने की मेज़ पर ही आंखें बंद करके बैठा था । 
तभी  उसने अपनी अन्तरात्मा से आती हुई आवाज़ सुनी जो कि ईश्वरीय ही थी । ईश्वर  ने कहा 
" मैं बहुत कुछ करता हूँ और ऐसी परिस्तिथियों को बदलने के लिए मैंने बहुत कुछ किया है । मैंने तुम्हें बनाया है ।" जैसे ही उस व्यक्ति को यह एहसास हुआ कि ईश्वर उस गरीब बालिका का उद्वार उसी के द्वारा 
करना चाहता है, वह बिना भोजन किये मेज़ से उठा और वापस उसी स्थान पर पहुंचा, जहाँ वह गरीब लड़की
खड़ी भीख मांग रही थी । वहां पहुँच कर उसने उस लड़की को कपडे दिए और भविष्य में उसे पढ़ाने लिखाने और 
एक सम्मानित नागरिक बनाने का पूरा खर्चा उठाया ।